Roothi Rani - Munshi Premchand
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The Story

पुस्तक: परिचय।

'रूठी रानी' प्रसिद्ध हिंदी लेखक मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक ऐतिहासिक उपन्यास है। यह 1907 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास में जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री रानी उमादेवी की ऐतिहासिक गाथा का वर्णन है, जो अपने स्वाभिमान के कारण मारवाड़ के शासक राव मालदेव से रूठकर आजीवन अलग रही थीं।

रूठी रानी एक ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसमें राजाओं की वीरता और देश भक्ति को कलम के आदर्श सिपाही प्रेमचन्द ने जीवन्त रूप में प्रस्तुत किया है।

उपन्यास में राजाओं की पारस्परिक फूट और ईर्ष्या के ऐसे सजीव चित्र प्रस्तुत किये गये हैं कि पाठक दंग रह जाता है। 'रूठी रानी' में बहुविवाह के कुपरिणामों, राजदरबार के षड़्यंत्रों और उनसे होने वाले शक्तिह्रास के साथ-साथ राजपूती सामन्ती व्यवस्था के अन्तर्गत स्त्री की हीन दशा के सूक्ष्म चित्र हैं।

उपन्यास में पौराणिक कथाओं के फ़ुट और तृष्णा के ऐसे साजीव चित्र प्रस्तुत किए गए हैं जिन्हें पाठक दंग रह जाता है।प्रस्तुत कृति में प्रेमचन्द ने देश की स्वतन्त्रता के प्रेमियों का आह्ववान करते हुए कहा है कि साहस एवं शौर्य के साथ एकता और संगठन भी आवश्यक है।

लेखक।

मुंशी प्रेमचंद।

धन्यवाद।

Description

पुस्तक: परिचय।

'रूठी रानी' प्रसिद्ध हिंदी लेखक मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक ऐतिहासिक उपन्यास है। यह 1907 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास में जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री रानी उमादेवी की ऐतिहासिक गाथा का वर्णन है, जो अपने स्वाभिमान के कारण मारवाड़ के शासक राव मालदेव से रूठकर आजीवन अलग रही थीं।

रूठी रानी एक ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसमें राजाओं की वीरता और देश भक्ति को कलम के आदर्श सिपाही प्रेमचन्द ने जीवन्त रूप में प्रस्तुत किया है।

उपन्यास में राजाओं की पारस्परिक फूट और ईर्ष्या के ऐसे सजीव चित्र प्रस्तुत किये गये हैं कि पाठक दंग रह जाता है। 'रूठी रानी' में बहुविवाह के कुपरिणामों, राजदरबार के षड़्यंत्रों और उनसे होने वाले शक्तिह्रास के साथ-साथ राजपूती सामन्ती व्यवस्था के अन्तर्गत स्त्री की हीन दशा के सूक्ष्म चित्र हैं।

उपन्यास में पौराणिक कथाओं के फ़ुट और तृष्णा के ऐसे साजीव चित्र प्रस्तुत किए गए हैं जिन्हें पाठक दंग रह जाता है।प्रस्तुत कृति में प्रेमचन्द ने देश की स्वतन्त्रता के प्रेमियों का आह्ववान करते हुए कहा है कि साहस एवं शौर्य के साथ एकता और संगठन भी आवश्यक है।

लेखक।

मुंशी प्रेमचंद।

धन्यवाद।